"Vasant Panchami 🙏 This day of special praise of Mother Saraswati 🙏 Know this today also"

या देवी सर्वभूतेषु विद्या रूपेण संस्थिता .. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

🚩ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्‌खमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम्॥

अर्थ: जो अपने करकमलों में, घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं। शरद-ऋतुके शोभासम्पत्र चन्द्रमाके समान, जिनकी मनोहर कान्ति है, जो तीनों लोकोंकी आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्योंका नाश करनेवाली हैं तथा गौरी के शरीर से जिनका प्राकट्य हुआ है, उन महासरस्वती देवी का, मैं निरन्तर भजन करता (करती) हूँ।

[दुर्गा सप्तशती (उत्तर चरित्र) पांचवें अध्याय का ध्यान श्लोक]

सरस्वती के बदले महासरस्वती रूप में देवी के हाथ में वीणा-पुस्तक नहीं होंगे। उनकी आठ भुजाएं होंगी, शस्त्र धारण करती हैं और उनके साथ रूद्र और विनायक जैसी शक्तियां होती हैं। देवी की उपासना के काल में केवल विद्यारम्भ नहीं होता शस्त्र पूजन भी होता है 🙏

गु॒ङ्गू
सि॒नी॒वा॒ली
रा॒का
सर॑स्वती
इ॒न्द्रा॒णी
व॒रु॒णा॒नी

🚩६ ऋतुओं की जन्मदात्री हैं।
इन्हे देवपत्नियाँ कहा गया है, अथर्ववेदसंहिता ७.४६ में सिनीवाली का विष्णु पत्नी के रूप में स्मरण है।
राका होलाका है अर्थात् फाल्गुनमास की पूर्णिमा को राका कहा है, और पूर्वकाल में फाल्गुन पूर्णिमा से वसन्त ऋतु प्रारम्भ होती थी। स्वाभाविक है कि उससे भी पूर्व शिशिरारम्भ होता था, इस कारण शिशिर को फल्गु भी कहा जाता है।

इनके नामों का सम्बन्ध पूर्णिमा के नक्षत्राभिमानी देवता से ही है।

प्राचीन भारत और नेपाल में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था। जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सरसों का फूल मानो सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर मांजर (बौर) आ जाता और हर तरफ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं। भर-भर भंवरे भंवराने लगते। वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती हैं। यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था 🙏
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लक्ष्मी र्मेधा धरा पुष्टि गौरी तुष्टि: प्रभा धृति:।
एताभि पाहि तनुभिरष्टाभिर्मा सरस्वति।।
अर्थात जहां सरस्वती निवास करती हैं वहां उनकी अष्ट विभूतियां लक्ष्मी, मेघा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टी और धृति का निवास होता है। इसीलिए ज्ञान की देवी की उपासना परम आवश्यक है।

सरस्वती मया दृष्टा वीणापुस्तकधारिणी
हंसवाहनसंयुक्ता विद्यादानं करोतु मे

प्रथमं भारती नाम द्वितीयञ्च सरस्वती
तृतीयं शारदा देवी चतुर्थं हंसवाहिनी

पञ्चमं तु जगन्माता षष्ठं वागीश्वरी तथा
सप्तमं चैव कौमारी चाऽष्टमं वरदायिनी

नवमं बुद्धिदात्री च दशमं ब्रह्मचारिणी
एकादशं चन्द्रघण्टा द्वादशं भुवनेश्वरी

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः
जिह्वाग्रे वसते तस्य ब्रह्मरूपा सरस्वती
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जापान में सरस्वती को ‘बेंजाइतेन’ कहते हैं। जापान में उनका चित्रन हाथ में एक संगीत वाद्य लिए हुए किया जाता है। जापान में वे ज्ञान, संगीत तथा ‘प्रवाहित होने वाली’ वस्तुओं की देवी के रूप में पूजित हैं।
दक्षिण एशिया के अलावा थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया, जापान एवं अन्य देशों में भी सरस्वती की पूजा होती है 🙏

अन्य भाषाओ/देशों में सरस्वती के नाम-
बर्मा – थुयथदी (သူရဿတီ=सूरस्सती, उच्चारण: [θùja̰ðədì] या [θùɹa̰ðədì])
बर्मा – तिपिटक मेदा Tipitaka Medaw (တိပိဋကမယ်တော်, उच्चारण: [tḭpḭtəka̰ mɛ̀dɔ̀])
चीन – बियानचाइत्यान Biàncáitiān (辯才天)
जापान – बेंज़ाइतेन Benzaiten (弁才天/弁財天)
थाईलैण्ड – सुरसवदी Surasawadee (สุรัสวดี)
ग्रीस में ईरोस – the god of sexual love, (कामदेव )
हेरा – Goddesses of Home and Wealth and Prosperity (महालक्ष्मी )
एथेना – the Goddesses of Wisdom and Learning. (सरस्वती)
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वैदिक सनातन एवं बौद्ध धर्मो की अपेक्षा जैन धर्म की सरस्वती (श्रुतदेवी) के वृहद स्तर पर पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं | जैन शिल्प में यक्षी, अंबिका एवं चक्रेश्वरी के बाद सरस्वती ही सर्वाधिक लोकप्रिय देवी रही है | सरस्वती (श्रुतदेवी) की सबसे प्राचीन प्रतिमा कंकाली टीले (मथुरा) से प्राप्त हुई है जो १३२ ई, की है ; इसके अतिरिक्त जैन परंपरा में बहुत ही सुंदर सरस्वती (श्रुतदेवी) प्रतिमाएं पल्लू (बीकानेर) और लाडनूँ आदि से प्राप्त हुई है |

(आजकल सोशल मीडिया पर एक प्रचार या कुतर्क चलता है कि सरस्वती (माँ शारदा) की पूजा भारत मे होती है परंतु ज्ञान तो बुद्धिस्ट देश जापान , चीन में आता है। ऐसा कहने और लिखने वाले जन्मजात वैज्ञानिक होने का प्रमाणपत्र लेकर आते हैं, साथ ही पैदा होने के साथ इनलोगों ने दुनिया घूमकर भी देख लिया होता है कि दुनिया में कहीं भी सरस्वती की पुजा नहीं होती।)

सबसे पहले जानिए कि पौराणिक हिन्दुओ में ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के नाम से विख्यात देवी की पूजा जापान और चीन दोनों जगहों पर होती है जिनका नाम जापान में Benzaiten ( 弁才天 , 弁財天 ) है , वहां के सभी शहरों में इनका मन्दिर है । चीन में इन्ही देवी को इन 3 नामो से “Biancaitian” or Tapien-ts’ai t’iennu or
Miao-yin mu जाना जाता है ये देवी भी वीणा (vina) लिए रहती है जिसको वहां biwa कहा जाता है ।
तिब्बत में सरस्वती देवी को Yang Chenmo के नाम से जाना जाता है । मंगोल में माँ सरस्वती को Keleyin ukin Tegri के नाम से जाना जाता है और थाईलैंड में माँ सरस्वती को Suratsawadi (สุรัสวดี) or
Saratsawadi (สรัสวดี) के नाम से पूजा जाता है 🙏
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दस ऋषिकुलों के आह्वान मंत्रों आप्री में तीन देवियाँ भारती, सरस्वती और इळा समान रूप और आदर में पायी जाती हैं। मेधातिथि और काण्व भारती के लिये ‘मही’ का प्रयोग करते हैं तो कुछ ऋषिकुल मही और भारती दोनों का।

भारती धरती है, सरस्वती जीवनस्रोत और इळा मानवीय प्रज्ञा। दो प्रतिद्वन्द्वी कुल कौशिक विश्वामित्र गाथिन(3.4) और वसिष्ठ मैत्रावरुणि (7.2) अलग स्थानों पर एक ही ऋचा का प्रयोग करते हैं।

इस प्राचीन, विराट और संस्कृतिबहुल देश के लिये आवश्यकता इस बात की है कि एकता के बिन्दु खोजें जायँ जहाँ विविधता के प्रति सम्मान हो, स्वीकार हो और साहचर्य हो न कि ऐसे जुमले जो विकट समस्याओं से भीत पाखंडी समाज को आँखें फेर कुकुरझौंझ के मौके प्रदान करें।

कौशिकों और मैत्रावरुणों के आह्वान स्वर में मेरा स्वर भी मिला लो देवियों! देश में सद्बुद्धि का प्रसार हो 🙏

आ भारती भारतीभि: सजोषा इळा देवैर्मनुष्येभिरग्नि:
सरस्वती सारस्वतोभिरर्वाक् तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं सदंतु।

🚩बसंत की बकधुन!
काषाय यानि कसैले मन की स्थिति में आया है वसंत। शीतोष्ण वायु है, आज कल के सूर्योदय भी नवीन लगते हैं। बुद्ध काषाय यानि गेरुआ को निर्मल मन की स्थिति से जोड़ते हैं लेकिन मेरा स्तर वह नहीं है।
ऑफिस के प्रांगण में कल पतझड़ से नग्न स्वनामित वनसेमलों को सदाबहार सिल्वर ओक के साथ देर तक निहारता रहा। जीवन ऐसा ही है, किसलिये कसैला होना? भीतर शीत और बाहर ऊष्मा, स्वेद का अनुभव करते किसी कोने में आह्लाद सा उठा। भान हुआ कि वसंत की पंचमी में हूँ। पीली मिठाई और पीले पुहुप मँगाया, सबको बता बता कर खिलाया कि आज वसंत पंचमी है, कल अवकाश के दिन भी रहेगी। गैरिक काषाय पीला हो चला – अमल।

सरसो फूलती गयी और मन के किसी कोने में सहमे से बैठे बच्चे किलकारियाँ मारते दौड़ चले…रसायन प्रभाव।
यह ऋतु पुष्पऋतु है। सौन्दर्य और आकर्षण की ऋतु है। मिलन की ऋतु है। सृष्टि के नूतन बीज उपजाने के लिये यज्ञ ऋतु है यह – जीवंत काम अध्वर!भारत में बहुत पहले से यह कामदेव की उपासना का काल रहा है जिसका समापन होली से होता है।

🚩एक प्रश्न उठा – वसंत का स्वागत पाँचवे दिन ही क्यों? यह क्या बात हुई कि नानाविहगनादित: कुसुमाकर: तिथि बता कर आता है और हम उसका अतिथियोग्य शिष्टाचार के साथ स्वागत करने के लिये भी पाँच दिन प्रतीक्षा करते हैं!
कुसमायुध कामदेव की ऋतु में विद्यादायिनी सरस्वती की उपासना क्यों?
कामदेव अनंग हैं यानि देहविहीन। विचित्र बात है न प्रेम का देव देहविहीन? वह अनंग इसलिये है कि समस्त जीवधारी उसके अंग हैं।
कुसुमायुध के तूणीर में खिली प्रकृति से लिये पाँच बाण रहते हैं जिनके नाम और प्रभाव अमरकोश में ऐसे दिये गये हैं:

अरविन्दम् अशोकं च च्युतं च नवमल्लिका ।
नीलोत्पलं च पञ्चैते पञ्चबाणस्य सायकाः ॥
उन्मादनस् तापनश् च शोषणः स्तम्भनस् तथा ।
संमोहनस्श् च कामश् च पञ्च बानाः प्रकीर्तिताः॥

कहीं ऐसा तो नहीं कि ऋतु आह्लाद के ‘आघातों’ का अनुभव करने और उन्हें अपने भीतर समो प्रकृति के नूतन रंग रसायनों से आपूरित हो जाने के लिये ये पाँच दिन दिये गये? जीवन की भागदौड़ में ठहर कर सायास अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का उद्योग पर्व तो नहीं यह? भारतीय मनीषा हर भाव को सम्मान देती है, हमारे यहाँ तो वीभत्स और जुगुप्सा भी रस हैं!
वसंत के पहले पाँच दिन ऐसे देखें क्या?
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पहले दिन हृदयक्षेत्र पर आघात और उन्माद।
दूसरे दिन ओठ – देह के ताप प्रभाव में ओठों की थरथराहट, अभिव्यक्ति!
तीसरे दिन मस्तिष्क भी विचलित और सभी उत्तेजनाओं को भीतर सोख लेना।
चौथे दिन आँखें, अरे सब कुछ तो आँखों से ही होता रहा, तो अलग से क्यों? स्तम्भन पर ध्यान देने से खम्भे की तरह जड़ीभूत होना समझ में आता है। यह स्थिर बिम्ब है जिसे कहते हैं आँखों में बसा लेना!
और सबसे बाद में सम्मोहन तीर, सर्वत्र आघात। सुध बुध खोना और बात है, सम्मोहित हो कुछ भी कर देना और बात।
अब विवेक की आवश्यकता है अन्यथा अनर्थ की पूरी सम्भावना है।
तो पाँचवे दिन विद्या विवेक की देवी की आराधना होती है। सौन्दर्य से उपजे राग भाव को उदात्तता की ओर ले जाना ताकि शृंगार उच्छृंखल न हो, सरस हो।
देवी के साथ पद्म है – वनस्पति सौन्दर्य का चरम, मोर है – जंतु सौन्दर्य का चरम, लेकिन वह नीर क्षीर विवेकी हंस की सवारी करती हैं। वीणा से संगीत का सृजन करती हैं तो पुस्तकधारिणी भी हैं 🙏

🚩वसंत पंचमी के दिन सरस्वती आराधना इसके लिये है कि ऋतु की शृंगार भावना रसवती हो किंतु विद्या के अनुशासन में! इस समय परिवेश में जो अपार सौन्दर्य बिखरा होता है, उसका आनन्द बिन विद्या के पूर्ण नहीं होता। उसके सूक्ष्म का, उसके स्थूल का, उसके समग्र का बिना विद्या के अवगाहन सम्भव नहीं! उससे काम पुष्ट होता है। काम जीवन का मूल है जिसके कारण उसकी पुष्टि जीवन को भरपूर करती है। क्रमश: पूर्णता की ओर बढ़ते हुये मनुष्य मुक्त हो, यही उद्देश्य है।

विद्या के साथ से रागात्मकता क्रमश: उदात्तता की ओर बढ़ती है जिसकी अभिव्यक्ति संगीत, कला, साहित्य, नृत्य आदि में उत्कृष्ट रूप में होती है। बौद्ध जन अविद्या या अवेज्ज पर बहुत मीमांसा किये हैं लेकिन वह निषेध अर्थ में है। विद्या का सूत्र यह है – सा विद्या या विमुक्तये, जो मुक्त करे वह विद्या है। जब आप ‘विद्वान’ होते हैं तो राग या प्रेम आप को बाँधते नहीं हैं, सौन्दर्य भी बाँधता नहीं है लेकिन आनन्द भरपूर होता है।

विद्या को घृणा से भी जोड़ कर देखना होगा। हम सब में घृणा है। जाने अनजाने हमारे व्यवहार घृणा से भी परिचालित होते हैं। घृणा से मुक्ति तो आदर्श स्थिति है लेकिन यदि घृणा की युति विद्या से हो जाय तो दो बातें होती हैं – विश्लेषण और कर्म। विश्लेषण और विवेक आप को अन्ध कूप में गिरने से बचाते हैं। ऐसे में घृणा से प्रेरित आप के कर्म क्रमश: विधेयात्मक होते जाते हैं। आप कारण के उन्मूलन की सोचने लगते हैं न कि कारकों के। यह एक ऐसी मानसिक अवस्था होती है जहाँ आप के प्रहार भी वस्तुनिष्ठ होते हैं। ऐसे में भीतर की घृणा जो कि एक आम जन होने के कारण आप में पैठी हुई है, निषेधात्मक प्रभाव नहीं छोड़ती। तो आज विद्या दिवस पर भीतर की घृणा का विश्लेषण करें, उसे विद्या से युत करें। द्रष्टा बनें।
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वायु शीतोष्ण है, अपनी त्वचा पर उसकी सहलान का अनुभव करें। सूर्योदय नये से दिखते हैं, उन्हें अपनी आँखों में स्थान दें। सौन्दर्य के लिये एक असंपृक्त सराह और अनुभूतिमय दृष्टि अपने भीतर विकसित करें। संसार और सुन्दर होगा।
पावका न: सरस्वती वाजेभि: वाजिनीवती यज्ञम् वष्टु धियावसुः
चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् यज्ञम् दधे सरस्वती
महो अर्ण: सरस्वती प्र चेतयति केतुना धियो विश्वा वि राजति। – ऋग्वेद
(देवी सरस्वती जो पवित्र करने वाली हैं, पोषण करने वाली हैं और जो बुद्धि से किए गए कर्म को धन प्रदान करती हैं। हमारे यज्ञ को सफल बनाएँ। जो सच बोलने की प्रेरणा देती हैं और अच्छे लोगों को सुमति प्रदान करने वाली हैं। जो नदी के जल के रूप में प्रवाहित होकर हमें जल प्रदान करती हैं और अच्छे कर्म करने वालों की बुद्धि को प्रखर बनाती हैं। वो देवी सरस्वती हमारे यज्ञ को सफल बनाएँ।)🙏

🚩सरस्वती वन्दना-
यह चिद्गगन-चन्द्रिका के लेखक कालिदास (सप्तम सदी) की रचना है। यहां कवि ने अपनी पदवी कालिदास कही है तथा साधना स्थान पूर्णपीठ (महाराष्ट्र के विदर्भ में) कहा है।
ॐकारपञ्जरशुकीमुपनिषदुद्यां केलिकलकण्ठीम्,
आगमबिपिनमयूरीमार्यामन्तर्विभावये गौरीम्॥।१॥
दयमान दीर्घनयनां दैशिकरूपेण दर्शिताभ्युदयाम्,
वामकुचनिहित वीणां वन्दे संगीत मातृकाम्॥२॥
अवटुतट घटित चूली तालीपलासताटङ्काम्,
वीणा वरानुसंगं विकचमदामोदमाधुरी भृङ्गम्।
करुणापूरतरङ्गं मलये मातङ्गकन्यकायाङ्गम्॥३॥ (सम्भवतः कुछ लुप्त है)

माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम्।
माहेन्द्रनीलद्युतिकोमलाङ्गीं मातंगकन्यां सततं स्मरामि॥४॥
अर्थ-(१) ॐकार पिंजड़ा है जिसमें सरस्वती सुग्गी के समान हैं। उपनिषद् रूपी उद्यान की कोयल हैं तथा आगम (तन्त्र, वेद भी-परम्परा से प्राप्त साहित्य) रूपी विपिन (वन) की मयूरी हैं। उनका ध्यान भीतर में गौरी के रूप में करता हूं।

टिप्पणी-वाणी के ४ पद हैं जिनमें ३ गुहा में हैं तथा चतुर्थ पद कथन या लेखन में निकलता है। भीतर के ३ पद गौरी (ग= तीसरा व्यञ्जन) हैं-परा, पश्यन्ती, मध्यमा। बाहर व्यक्त या वैखरी वाणी में कुछ लुप्त हो जाता है अतः उसे तम कहते हैं। गौ तथा तम का सम्बन्ध गौतम का न्याय दर्शन है।
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥ (ऋग्वेद १/१६४/४५)
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परायामङ्कुरीभूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८॥
मध्यमायां मुकुलिता वैखर्या विकसीकृता॥ (योगकुण्डली उपनिषद् ३/१८, १९)
अक्षरं परमो नादः शब्दब्रह्मेति कथ्यते। मूलाधारगता शक्तिः स्वाधारा बिन्दुरूपिणी॥२॥
तस्यामुत्पद्यते नादः सूक्ष्मबीजादिवाङ्कुरः। तां पश्यन्तीं विदुर्विश्वं यया पश्यन्ति योगिनः॥३॥
हृदये व्यज्यते घोषो गर्जत्पर्जन्यसंनिभः। तत्र स्थिता सुरेशान मध्यमेत्यभिधीयते॥४॥
प्राणेन च स्वराख्येन प्रथिता वैखरी पुनः। शाखापल्लवरूपेण ताल्वादिस्थानघट्टनात्॥५॥ (योगशिखोपनिषद् ३/२-५)
(२) सरस्वती दया-युक्त हैं, दीर्घ नयन वाली हैं। दैशिक (या देशिक, जो दिशा दिखाये, गुरु) रूप में अभ्युदय का मार्ग दिखाया है। वाम स्तन पर वीणा है तथा सभी संगीत की मातृका (वर्णमाला) हैं।

🚩टिप्पणी-मीमांसा दर्शन के आरम्भ में अभ्युदय तथा निःश्रेयस के लिये यह दर्शन कहा गया है। युधिष्ठिर ने जब परीक्षित को राज्य देकर संन्यास ग्रहण किया (२२-८-३१०२ ईसा पूर्व), उस दिन जय संवत्सर आरम्भ हुआ था तथा अभ्युदय के लिय्र् निकले, अतः इसे जयाभ्युदय-शक कहा गया है। जनमेजय के सभी दानपत्रों में इसी शक का प्रयोग है।

अभ्युदय = धर्ममार्ग, निःश्रेयस = मोक्ष।
वर्णों से सभी प्रकार के शब्द-वाक्य आदि से युक्त साहित्य बनते हैं, अतः इसे मातृका (माता समान) कहा गया है।
(३) वटु (छात्र) को सरस्वती के पास जाने पर और किसी तट (आश्रय) की जरूरत नहीं होती। वह चूली (चूल = चोटी) अर्थात् शिखर पर पहुंच जाता है। ताली (ताल =संगीत का स्वर) अर्थात् संगीत शिक्षा की मूल हैं। पलास (वेद) रूपी ताटङ्क (कान का कुण्डल) है। श्रेष्ठ वीणा के साथ हैं। अर्थों के मूल में पहुंचने वाली (वि-कच = बिना केश का, बाल की खाल निकालना)। शास्त्र-माधुरी का आनन्द लेने वाली भृङ्ग (भ्रमर) हैं। वह करुणा ती तरङ्ग से भरी हैं। मलय (चन्दन सुगन्ध युक्त) मातङ्ग (१० वीं महाविद्या, रामायण काल के एक ऋषि की कन्या रूप में) की कन्या रूप में हैं 🙏

टिप्पणी-वट वृक्ष गुरु शिष्य परम्परा का प्रतीक है अतः वह आदि गुरु शिव का चिह्न है। जैसे वट वृक्ष की शाखा जमीन से लग कर उसी के जैसा वृक्ष बन जाती है, उसी प्रकार गुरु शिष्य को अपना ज्ञान देकर अपने जैसा बना देता है। (दक्षिणामूर्ति स्तोत्र का अन्तिम श्लोक)। अतः शिष्य को वटु कहते हैं। वट के मूल द्रुम से जो अन्य द्रुम निकलते हैं, उनको दुमदुमा कहते हैं-सोमनाथ में दुमियाणी, भुवनेश्वर में दुमदुमा, कोलकाता के दक्षिणेश्वर के निकट दुमदुमा (दमदम हवाई अड्डा), कामाख्या के निकट दुमदुमा (बंगलादेश सीमा पर), वैद्यनाथ धाम का दुमका।
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मुण्डकोपनिषद् के अनुसार मूल अथर्व वेद से ३ अन्य शाखायें निकलीं-ऋक्, यजु;, साम, जैसे पलास की टहनी से ३ पत्ते निकलते हैं (फिर वही ढाक के ३ पात)। अतः पलास ब्रह्मा या वेद का चिह्न है। शाखा निकलने से मूल नष्ट नहीं होता, अतः त्रयी का अर्थ ४ वेद होते हैं, १ मूल + ३ शाखा।
मतङ्ग का अर्थ हाथी भी होता है। व्यक्त वैखरी वाणी स्थूल है अतः उसे मतङ्ग भी कहते हैं। वह सुनने पर शुद्ध अर्थ सरस्वती की कृपा से ज्ञात होता है।

(४) माणिक्य की वीणा को गोद में रख कर बजा रही हैं (उपलालयन्तीम्)। मञ्जुल वाणी के विलास में मग्न या मदमस्त हैं। उनकी शोभा माहेन्द्र-नील है, तथा कोमल अंग हैं। ऐसी मातंग कन्या का मैं सतत् स्मरण करता हूं
टिप्पणी-सामान्यतः गौरी वाक् के रूप में सरस्वती को सदा गौरी कहा गया है। किन्तु व्यक्त वाणी तम है, अतः इस रूप में नील वर्ण का कहा गया है।
पूर्व तट का पर्वत महेन्द्र पर्वत है, ओडिशा के फूलबानी से आन्ध्र के राजमहेन्द्री तक। रामायण में रामेश्वरम तक महेन्द्र पर्वत कहा गया है। उसके निकट जगन्नाथ का स्थान नीलाचल कहलाता है। उनकी या कृष्ण की जैसी श्याम शोभा है, वैसी हई मातङ्गी रूप में सरस्वती की शोभा है।

   🚩🙏🚩सर्वे हिंदू भवन्तु सुखिनः 🚩🙏🚩

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By Ashwani Hindu

अशवनी हिन्दू (शर्मा) मुख्य सेवादार "सनातन धर्म रक्षा मंच" एवं ब्यूरो चीफ "सनातन समाचार"। जीवन का लक्ष्य: केवल और केवल सनातन/हिंदुत्व के लिए हर तरह से प्रयास करना और हिंदुत्व को समर्पित योद्धाओं को अपने अभियान से जोड़ना या उनसे जुड़ जाना🙏

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