“Have Hindus forgotten? Salute to you if you don’t forget Why did Veer Hakikat Rai ji sacrifice?”

आज हर हिंदू को उस छोटे बालक से प्रेरणा लेने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।

सनातन 🚩समाचार🌎 बात तबकी है जब भारत पर मुगलों (गौभक्षक प्रजाति) का शासन था। उस समय ……….

एक चौदह वर्षीय हकीकत राय (Veer Hakikat Rai) उन दिनों विद्यालय में पढ़ता था। एक दिन कुछ बच्चों ने मिलकर हकीकत राय को गालियाँ दीं। पहले तो वह चुप रहा। किन्तु जब उन उद्दण्ड बच्चों ने गुरुओं के नाम की, झूलेलाल व गुरु नानक जी के नाम के साथ हिंदू देवी देवताओं को भी गालियाँ देना शुरु किया तब उस वीर बालक से अपने गुरु और धर्म का अपमान सहा नहीं गया। तब हकीकत राय ने कहाः “अब हद हो गयी ! अपने लिये तो मैंने सहनशक्ति का उपयोग किया लेकिन मेरे धर्म, गुरु और भगवान के लिए एक भी शब्द बोलोगे तो यह मेरी सहनशक्ति से बाहर की बात है। मेरे पास भी जुबान है। मैं भी तुम्हें बहुत कुछ बोल सकता हूँ ।

उद्दण्ड बच्चों ने कहाः “बोलकर तो दिखा ! हम तेरी खबर ले लेंगे ।”
फिर हकीकत राय ने भी उनको दो चार कटु शब्द सुना दिये। बस, उन्हीं दो चार शब्दों को सुनकर मुल्ला-मौलवियों का खून उबल पड़ा। वे हकीकत राय को ठीक करने का मौका ढूँढने लगे। सब लोग एक तरफ और हकीकत राय अकेला दूसरी तरफ।

उस समय मुगलों का शासन था इसलिए हकीकत राय को जेल में बन्द कर दिया गया।
मुगल शासकों की ओर से हकीकत राय को यह फरमान भेजा गया किः “अगर तुम कलमा पढ़ लो और मुसलमान बन जाओ तो तुम्हें अभी माफ कर दिया जायेगा और यदि तुम मुसलमान नहीं बनोगे तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा ।”

हकीकत राय के माता-पिता जेल के बाहर आँसू बहा रहे थे किः “बेटा ! तू मुसलमान बन जा। कम से कम हम तुम्हें जीवित तो देख सकेंगे !” ….. लेकिन उस बुद्धिमान सिंधी बालक ने कहाः “क्या मुसलमान बन जाने के बाद मेरी मृत्यु नहीं होगी ?”
माता-पिताः “मृत्यु तो होगी ।”
हकीकत रायः “…तो फिर मैं अपने धर्म में ही मरना पसंद करूँगा। मैं जीते-जी दूसरों के धर्म में नहीं जाऊँगा।”

क्रूर शासकों ने धर्मनिष्ठ हकीकत राय की दृढ़ता देखकर अनेकों धमकियाँ दीं लेकिन उस बहादुर किशोर पर उनकी धमकियों का कोई जोर न चल सका। उसे अपने धर्म से पूरा राज्य-शासन भी न डिगा सका।
अंत में मुगल शासक ने उसे प्रलोभन देकर अपनी ओर खींचना चाहा लेकिन वह बुद्धिमान व वीर किशोर प्रलोभनों में भी नहीं फँसा।

आखिर क्रूर गौभक्षक मुसलमान शासकों ने आदेश दिया किः “अमुक दिन बीच मैदान में हकीकत राय का शिरोच्छेद किया जायेगा ।”

उस वीर हकीकत राय ने गुरु का मंत्र ले रखा था। गुरुमंत्र जपते-जपते उसकी बुद्धि सूक्ष्म हो गयी थी। वह चौदह वर्षीय किशोर जल्लाद के हाथ में चमचमाती हुई तलवार देखकर जरा भी भयभीत न हुआ वरन् वह अपने गुरु के दिये हुए ज्ञान को याद करने लगा किः “यह तलवार किसको मारेगी ? मार-मारकर इस पंचभौतिक शरीर को ही तो मारेगी और ऐसे पंचभौतिक शरीर तो कई बार मिले और कई बार मर गये । ….तो यह तलवार मुझे क्या मारेगी ??? नहीं !! मैं तो अमर आत्मा हूँ… परमात्मा का सनातन अंश हूँ । मुझे यह कैसे मार सकती है ? ૐ…ૐ….ૐ…

धर्मपरायण हकीकत राय गुरु के इस ज्ञान का चिंतन कर रहा था, तभी क्रूर काजियों ने जल्लाद को तलवार चलाने का आदेश दिया। जल्लाद ने तलवार उठायी लेकिन उस निर्दोष बालक को देखकर उसकी अंतरात्मा थरथरा उठी। उसके हाथों से तलवार गिर पड़ी और हाथ काँपने लगे ।
काज़ी बोलेः “तुझे नौकरी करनी है कि नहीं ? यह तू क्या कर रहा है ?”

तब हकीकत राय ने अपने हाथों से तलवार उठायी और जल्लाद के हाथ में थमा दी। फिर वह किशोर हकीकत राय आँखें बंद करके परमात्मा का चिंतन करने लगाः ʹहे अकाल पुरुष ! जैसे साँप केंचुली का त्याग करता है.. वैसे ही मैं यह नश्वर देह छोड़ रहा हूँ । मुझे तेरे चरणों की प्रीति देना ताकि मैं तेरे चरणों में पहुँच जाऊँ… फिर से मुझे वासना का पुतला बनाकर इधर-उधर न भटकना पड़े… अब तू मुझे अपनी ही शरण में रखना…
मैं तेरा हूँ…तू मेरा है… हे मेरे परमात्मा।

इतने में जल्लाद ने तलवार चलायी और हकीकत राय का सिर धड़ से अलग हो गया।


हकीकत राय ने 14 वर्ष की नन्हीं सी उम्र में अपने धर्म के लिए अपना बलिदान दे दिया। उसने शरीर छोड़ दिया लेकिन धर्म न छोड़ा।
हकीकत राय जी तो धर्म के लिए बलिवेदी पर चढ़ गए किंतु उनके बलिदान ने हिंदू समाज के हजारों-लाखों जवानों में एक जोश भर दिया किः
धर्म की रक्षा के लिए प्राण देना पड़े तो देंगे लेकिन विधर्मियों के आगे कभी नहीं झुकेंगे। भले अपने धर्म में भूखे मरना पड़े तो स्वीकार है लेकिन परधर्म को कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

अब यही जयघोष लगाने चाहिएं

ऐसे वीरों के बलिदान के फलस्वरूप ही हमें आजादी प्राप्त हुई है। अब हिंदुओं को सावधान रहना होगा। प्रत्येक हिंदू के मन में अपने धर्म के प्रति श्रद्धा एवं आदर होना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी कहा हैः
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुतिष्ठात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।।
अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।ʹ (गीताः 3.35)

क्या अपको पता है की आज वसंत पंचमी के के दिन (4 फरवरी 1734) ही 14 वर्षीय अमर बलिदानी वीर बालक वीर हकीकत राय जी ने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण त्याग दिए थे।

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By Ashwani Hindu

अशवनी हिन्दू (शर्मा) मुख्य सेवादार "सनातन धर्म रक्षा मंच" एवं ब्यूरो चीफ "सनातन समाचार"। जीवन का लक्ष्य: केवल और केवल सनातन/हिंदुत्व के लिए हर तरह से प्रयास करना और हिंदुत्व को समर्पित योद्धाओं को अपने अभियान से जोड़ना या उनसे जुड़ जाना🙏

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