🚩पद्मनाभ स्वामी मंदिर की आजादी की बधाई🌹अब बाकी मन्दिरों से कब हटेंगे सरकारी कब्जे❓


मलेच्छो एवं केरल की कम्युनिस्ट सरकार के चंगुल से मुक्त हुआ ⛳पद्मनाभ स्वामी मंदिर…

दो लाख करोड़ की संपत्ति और महान विरासत वाला पद्मनाभस्वामी मंदिर अब सरकार के स्वामित्व मे नही रहेगा अब इसकी देखभाल त्रावणकोर रायल परिवार करेगा…

🔺👉इस केस को सुब्रमण्यम स्वामी जी ने लड़ा और मंदिर को म्लेछों से मुक्त कराया, मंदिर प्रबंधन के सभी सदस्य अब हिन्दू ही होगें।

🔺👉यह आरम्भ है मंदिरों के सरकारी कब्जों से मुक्त होने का। परन्तु लड़ाई अभी लम्बी है।🚩🚩

पद्मनाभ स्वामी मंदिर को मिला उसका अधिकार कैसे मुक्त होंगे शेष मंदिर ?

पद्मनाभ मंदिर हिंदुओं की प्रबल आस्था का केंद्र जिस पर केरल सरकार ने कब्जा किया हुआ था जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दिया है जिससे यह सिद्ध हुआ है कि केरल सरकार ने हिंदुओं के इस प्रसिद्ध और पवित्र मंदिर पर अवैध कब्जा किया हुआ था। लगभग आठ-नौ वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के पश्चात् आखिर सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया है कि केरल स्थित स्वामी पद्मनाभ मंदिर के प्रबंधन एवं निर्णय में त्रावनकोर के महाराज मार्तंड वर्मन राजवंश की ही प्रमुख भूमिका रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से सभी हिंदुओं में प्रसन्नताO का वातावरण है और सभी सनातनी इस निर्णय का स्वागत कर रहे हैं जैसा कि सभी जानते हैं 2011 में वामपंथ-काँग्रेस और विधर्मियों ने मिलकर हिंदुओं के इस पवित्र मंदिर की अकूत सम्पदा हड़पने के लिए एक कुटिल षड्यंत्र रचा था, जिसके चलते हैं केरल हाईकोर्ट ने मंदिर की अपार धन-सम्पदा से लबालब भरे कई तहखानों को खोलकर वहाँ से निकलने वाली संपत्ति के लिए एक शासकीय अधिकारी, एक रिटायर्ड न्यायाधीश और एक महालेखाकार को नियुक्त कर दिया था।

हाईकोर्ट के इस निर्णय से समस्त सनातनी समाज ने यह भांप लिया था कि अब इस पवित्र मंदिर की अकूत संपदा की बहुत पाप पूर्ण तरीके से बंदरबांट होगी। इसके साथ ही सभी धर्म प्रेमियों का यह मानना था की जिस राजवंश ने सैकड़ों वर्षों से पद्मनाभ मंदिर के इस विपुल खजाने की रक्षा, सत्यता एवं ईमानदारी से रक्षा की है, वह लूटा जाएगा अथवा कु-प्रबंधित किया जाएगा। तब इस सब से आहत होकर राजवंश के उत्तराधिकारियों और भगवान विष्णु के परम भक्तों ने हाईकोर्ट के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस चुनौती द्वारा सरकारी संरक्षण में चल रहे देश के प्रमुख मंदिरों की संपत्ति की लूट, मंदिरों की भूमि में हेराफेरी एवं सनातन धर्मियों द्वारा मंदिरों को प्राप्त दान के बेहद घटिया प्रबंधन एवं सनातन का पैसा विधर्मियों पर लुटाने की घृणित प्रवृत्ति को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उजागर किया।

अंतत: सुप्रीम कोर्ट को यह मानना पड़ा कि वास्तव में यदि स्वामी पद्मनाभ मंदिर का प्रबंधन सरकारी हाथों में चला गया, तो इसकी खरबों रूपए की संपत्ति को बर्बाद होने से कोई बचा नहीं सकेगा। खासकर यह बिंदु निर्णयात्मक सिद्ध हुआ कि सैकड़ों वर्षों से त्रावणकोर के मार्तंड राजवंश ने इस खजाने का उपयोग कभी भी कहीं भी अपने निजी उपयोग हेतु नहीं किया और ना ही मंदिर के प्रबंधन में ऐसी कोई लूट मचाई।

🔺👉जब यह शुभ समाचार त्रावणकोर के युवराज आदित्य वर्मा ने अपनी माँ गौरी लक्ष्मी को सुनाया तो दोनो प्रसन्नता से रो पड़े।

केरल के विश्वप्रसिद्ध स्वामी पद्मनाभ मन्दिर के तहखानों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत खोला गया और जान बूझकर इस पवित्र मंदिर के खजाने का विवरण सार्वजनिक किया जाता रहा। विद्वानों के अनुसार यह खजाना लगभग एक लाख करोड़ से भी अधिक का हो सकता है। मन्दिर के तहखानों से मिली वस्तुओं की सूची में भगवान विष्णु की एक भारी-भरकम सोने की मूर्ति, ठोस सोने के जवाहरात मढ़े हुए नारियल, कई फुट लम्बी सोने की मोटी रस्सियाँ, कई किलो सोने के बने हुए चावल के दाने, सिक्के, गिन्नियाँ, मुकुट एवं हीरे मिलने का सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा था।

उल्लेखनीय है कि भगवान पद्मनाभ का यह मन्दिर बहुत प्राचीन काल से करोड़ों विष्णु भक्तों की आस्था का केन्द्र रहा है। त्रावणकोर के महाराजा मार्तण्ड वर्मन का राजवंश भगवान पद्मनाभ स्वामी का बहुत बड़ा भक्त रहा है, इस राजवंश ने अपनी सारी सम्पत्ति तथा भक्तों द्वारा भेंट की गई बहुमूल्य सामग्रियों को मन्दिर के नीचे 6 तहखानों में छिपा रखा था। त्रावणकोर राजवंश ने सन 1750 में ही पूरे घराने को पद्मनाभ दास घोषित कर दिया था, इस घराने की रानियाँ पद्मनाभ सेविनी कहलाती हैं। कांग्रेस-सेकुलरों तथा वामपंथी सरकारों द्वारा जिस तरह से लगातार हिन्दू आस्थाओं की खिल्ली उड़ाना, हिन्दू मन्दिरों की धन-सम्पत्ति हड़पने की कोशिशें करना, हिन्दू सन्तों एवं धर्माचार्यों को अपमानित एवं तिरस्कारित करने का जो अभियान चलाया जा रहा था और वह किसके इशारे पर हो रहा था यह न तो बताने की आवश्यकता है और न ही हिन्दू इतने मूर्ख हैं जो यह समझ न सकें।

उदाहरण स्वरूप कांची के शंकराचार्य जी को ठीक दीपावली की रात को गिरफ़्तार किये जाने से लेकर, उड़ीसा में स्वामी लक्षमणानन्द सरस्वती की हत्या, नित्यानन्द को सैक्स स्कैण्डल में फाँसना, स्वामी असीमानन्द को बम विस्फोट के झूठे आरोप में घसीटना, साध्वी प्रज्ञा को हिन्दू आतंकवादी दर्शाना तथा 85 वर्षीय बुजुर्ग संत श्री आसारामजी बापू को एक बड़े यंत्र के तहत जेल में भेज देना सहित इनके बहुत सारे कारनामे हैं, और इसी कड़ी में यह स्वामी पद्मनाभ मंदिर पर कब्जा किया जाना भी था।

एक याचिकाकर्ता टीपी सुन्दरराजन (असली हिंदू या कोई धर्म-परिवर्तित ईसाई ) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके स्वामी पद्मनाभ मन्दिर ट्रस्ट की समस्त गतिविधियों तथा आर्थिक लेनदेन को पारदर्शी बनाने हेतु मामला दायर किया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार दो जज श्री एमएन कृष्णन तथा सीएस राजन, केरल के मुख्य सचिव के जयकुमार, मन्दिर के मुख्य प्रशासक हरिकुमार, पुरातत्त्व विभाग के एक अधिकारी तथा त्रावणकोर राजवंश के दो प्रमुख सदस्यों की उपस्थिति में तहखानों को खोलने तथा निकलने वाली वस्तुओं की सूची एवं मूल्यांकन का काम शुरु किया गया। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश था कि जब तक सूची पूरी करके न्यायालय में पेश न कर दी जाए, तब तक किसी अखबार या पत्रिका में इस खजाने का कोई विवरण प्रकाशित न किया जाए, परन्तु इसके बावजूद सबसे पहले एक कथित सेकुलर पत्रिका मलयाला मनोरमा ने इस आदेश की धज्जियाँ उड़ाईं और भगवान विष्णु की मूर्ति की तस्वीरें तथा सामान की सूची एवं उसके मूल्यांकन सम्बन्धी खबरें प्रकाशित कीं।

…..मार्तंड वर्मन राजवंश परिवार ….

फिर तो हिंदू विरोधी न्यूज़ चैनलों ने इसके ऊपर बकायदा एपिसोड चलाने चालू कर दिए तथा हिंदुओं को बदनाम करने के लिए चटखारे ले-लेकर बताया गया कि मन्दिर के पास कितने करोड़ की सम्पत्ति है, इस धन का कैसे कथित सदुपयोग किया जाए इत्यादि। हालांकि न तो याचिकाकर्ता ने और न ही मलयाला मनोरमा ने आज तक कभी भी चर्च की सम्पत्ति, उसे मिलने वाले भारी-भरकम विदेशी अनुदानों, चर्च परिसरों में संचालित की जा रही व्यावसायिक गतिविधियों से होने वाली आय तथा विभिन्न मस्जिदों एवं मदरसों को मिलने वाले जकात एवं खैरात के हिसाब-किताब एवं पारदर्शितापर कभी भी सवाल नहीं उठाया।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि …..

1 – सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त इस समिति में उपस्थित किसी भेदिये के अलावा मन्दिर का कौन सा कर्मचारी इन हिन्दू विरोधी ताकतों से मिला हुआ है ?
2 – क्या सुप्रीम कोर्ट मलयाला मनोरमा के खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा दर्ज करेगा ?
3 – क्या इस विशाल खजाने की गिनती और सूचीबद्धता की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई थी ?
4 – मलयाला मनोरमा जैसी चर्च पोषित पत्रिकाएं मन्दिर और तहखानों के नक्शे बना-बनाकर प्रकाशित कर रहे थीं, ऐसे में सुरक्षा सम्बन्धी गम्भीर सवालों को क्यों नजरअन्दाज किया गया, क्योंकि खजाने की गिनती और मन्दिर में हजारों दर्शनार्थियों के नित्य दर्शन एक साथ ही चल रहे थे। इस विशाल धन-सम्पत्ति की मात्रा और मन्दिर में आने वाले चढ़ावे की राशि को देखते हुए, क्या किसी आतंकवादी अथवा माफिया संगठन के सदस्य दर्शनार्थी बनकर इस स्थान की रेकी नहीं कर सकते ? तब इन सेकुलर-वामपंथी पत्रकारों एवं अखबारों को यह विस्तृत जानकारी प्रकाशित करने का क्या अधिकार था ???

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि त्रावणकोर राजवंश के सभी सदस्यों को इस खजाने के बारे में पीढिय़ों से जानकारी थी, परन्तु भारत के वर्तमान राजनैतिक राजवंशों की तरह मार्तण्ड वर्मा राजवंश ने इस सम्पत्ति को स्विस बैंक में जमा नहीं किया। मार्तण्ड वर्मा राजवंश ने इस सम्पत्ति को पहले मुगलों की नीच दृष्टि से बचाकर रखा, फिर अंग्रेजों को भी इसकी भनक नहीं लगने दी, और अब सेकुलर-वामपंथी गठजोड़ की लूट से भी इस खजाने की रक्षा की है। आप सरकारी कब्जे वाले मंदिरों में यही सोचकर दान करते हैं कि इससे गरीबों का भला होगा या मन्दिर का विकास होगा तो क्षमा करें आप बहुत ही भोले और मूर्ख हैं।

जो पैसा या अमूल्य वस्तुएं आप सरकारी कब्जे वाले मन्दिर को दान देंगे, वह किसी सेकुलर या वामपंथी की जेब में पहुँचेगी अथवा इस पैसों का उपयोग हज के लिए सब्सिडी देने, नई मस्जिदों के निर्माण में सरकारी सहयोग देने, ईसाईयों को बेथलेहम की यात्रा में सब्सिडी देने में ही खर्च होने वाला है। रही मन्दिरों में सुविधाओं की बात, तो सबरीमाला का हादसा अभी सबके दिमाग में ताजा है। केरल में हमेशा से सेकुलर-वामपंथी गठजोड़ ही सत्ता में रहा है, जो पिछले 60 साल में इन पहाडिय़ों पर पक्की सीढिय़ाँ और पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं कर पाया है, जबकि अय्यप्पा स्वामी के इस मन्दिर से देवस्वम बोर्ड को प्रतिवर्ष करोड़ों की आय होती है। लगभग यही स्थिति तिरुपति स्थित तिरुमाला के मन्दिर ट्रस्ट की है, जहाँ सुविधाएं तो हैं परन्तु ट्रस्ट में अधिकतर राजशेखर रेड्डी के ईसाई चमचे भरे पड़े हैं, जो मंदिर में आने वाले हिन्दुओं के धन का दुरुपयोग करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस खजाने की रक्षा एवं इसके उपयोग के बारे में सुझाव माँगे हैं। सेकुलरों और वामपंथियों ने दुर्भाव से इस पवित्र धन को काला धन बताते हुए इसे सरकारी खाते में जमा कर देने सम्बन्धी हिन्दू विरोधी सुझाव दिया है। अब कुछ सनातनी सुझावों पर भी गौर कर लेते हैं ……

1 – सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक हिन्दू मन्दिर धार्मिक सम्पत्ति काउंसिल का गठन किया जाए। इस काउंसिल में सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान, दो निवृत्त न्यायाधीश, एवं सभी प्रमुख हिन्दू धर्मगुरु शामिल हों। इस काउंसिल में पद ग्रहण करने की शर्त यह होगी कि सम्बन्धित व्यक्ति न पहले कभी चुनाव लड़ा हो और न काउंसिल में शामिल होने के बाद लड़ेगा (यानी राजनीति से बाहर)। इस काउंसिल में अध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष का पद त्रावणकोर के राजपरिवार के पास रहे।
2 – इस काउंसिल के पास सभी प्रमुख हिन्दू मन्दिरों, उनके शिल्प, उनके इतिहास, उनकी संस्कृति के रखरखाव, प्रचार एवं प्रबन्धन का अधिकार हो।
3 – इस काउंसिल के पास जो अतुलनीय और अविश्वसनीय धन एकत्रित होगा वह वैसा ही रहेगा, परन्तु उसके ब्याज से सभी प्रमुख मन्दिरों की साज-सज्जा, साफ़-सफाई एवं प्रबन्धन किया जाएगा।
4 – इस विशाल रकम से प्रतिवर्ष 2 लाख हिन्दुओं को (रजिस्ट्रेशन करवाने पर) अमरनाथ, वैष्णो देवी, गंगासागर, सबरीमाला, मानसरोवर (किसी एक स्थान) अथवा किसी अन्य स्थल की धार्मिक यात्रा मुफ्त करवाई जाएगी। एक परिवार को पाँच साल में एक बार ही इस प्रकार की सुविधा मिलेगी। देश के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों पर काउंसिल की ओर से सर्वसुविधायुक्त धर्मशालाएं बनवाई जाएं, जहाँ गरीब व्यक्ति भी अपनी धार्मिक यात्रा में तीन दिन तक मुफ्त रह-खा सके।
5 – इसी प्रकार पुरातात्विक महत्व के किलों, प्राचीन स्मारकों के आसपास भी सिर्फ हिन्दुओं के लिए इसी प्रकार की धर्मशालाएं बनवाई जाएं जिनका प्रबन्धन काउंसिल करेगी।
6 – नालन्दा एवं तक्षशिला जैसे 50 विश्वविद्यालय खोले जाएं, जिसमें भारतीय संस्कृति, भारतीय वेदों, भारत की महान हिन्दू सभ्यता इत्यादि के बारे में विस्तार से शोध, पठन, लेखन इत्यादि किया जाए। यहाँ पढऩे वाले सभी छात्रों की शिक्षा एवं आवास मुफ्त हो।

बहरहाल बड़ी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से सारा सनातनी समाज बहुत प्रसन्न है, और साथ ही यह आवाजें भी उठ रही हैं कि शीघ्र ही बाकी मंदिरों को सरकारी कब्जों से मुक्त किया जाए।


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