बिहार में सबसे महंगा पेट्रोल-डीजल क्यों? जानिए सरकार हर लीटर पर कितना टैक्स वसूल रही

पेट्रोल पंप पर लगी फ्यूल मशीन और वाहनों की कतार
पेट्रोल पंप पर लगी फ्यूल मशीन और वाहनों की कतार

पटना: देश के सबसे गरीब राज्यों में गिने जाने वाले बिहार में आज पेट्रोल-डीजल की कीमतें देश के कई बड़े और समृद्ध महानगरों से भी ज्यादा हो चुकी हैं। राजधानी पटना से लेकर भागलपुर और मुजफ्फरपुर तक पेट्रोल ₹113 से ₹115 प्रति लीटर के बीच बिक रहा है, जबकि डीजल भी ₹100 के करीब पहुंच चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर बिहार में तेल इतना महंगा क्यों है और राज्य सरकार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए टैक्स कम क्यों नहीं कर रही।

दरअसल, 25 मई को तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में ₹2.61 प्रति लीटर और डीजल में ₹2.71 प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी। इसके बाद पटना में पेट्रोल ₹113.35 और डीजल ₹99.36 प्रति लीटर पहुंच गया। मुजफ्फरपुर में पेट्रोल ₹114.13 और डीजल ₹100.09 प्रति लीटर बिक रहा है। वहीं भागलपुर में पेट्रोल ₹114.31 और डीजल ₹100.24 प्रति लीटर तक पहुंच चुका है। सीमांचल और सुदूर जिलों जैसे अररिया और किशनगंज में परिवहन खर्च ज्यादा होने की वजह से पेट्रोल ₹115 प्रति लीटर के पार बिकने की जानकारी सामने आ रही है।

बिहार में पेट्रोल-डीजल महंगा होने की सबसे बड़ी वजह राज्य सरकार द्वारा लगाया जाने वाला भारी VAT और उस पर लगने वाला 30% सरचार्ज है। दिल्ली जैसे राज्यों में पेट्रोल पर VAT करीब 19.4% है, जबकि बिहार में पेट्रोल पर 23.58% VAT या ₹16.65 प्रति लीटर, जो भी अधिक हो, लगाया जाता है। इसके ऊपर 30% सरचार्ज भी वसूला जाता है। इस तरह बिहार सरकार पेट्रोल पर करीब ₹21.64 प्रति लीटर टैक्स वसूल रही है।

इसी तरह डीजल पर बिहार में 16.37% VAT या ₹12.33 प्रति लीटर टैक्स लगता है। इसके ऊपर 30% सरचार्ज जोड़ने के बाद सरकार को डीजल पर करीब ₹16 प्रति लीटर की कमाई होती है। यही वजह है कि बिहार में तेल की कीमतें पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा से भी ज्यादा हैं।

तेल महंगा होने की दूसरी बड़ी वजह बिहार में बड़ी कच्चे तेल रिफाइनरी का अभाव है। हालांकि बरौनी रिफाइनरी मौजूद है, लेकिन राज्य के कई हिस्सों तक तेल पहुंचाने के लिए लंबी दूरी तक पाइपलाइन और टैंकरों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इस परिवहन लागत का असर भी सीधे खुदरा कीमतों पर पड़ता है। इसके अलावा अलग-अलग जिलों में डीलर कमीशन और ढुलाई खर्च भी अलग होता है, जिससे जिलों के हिसाब से कीमतों में अंतर दिखाई देता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक बिहार सरकार के लिए पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला VAT अब सबसे बड़ा राजस्व स्रोत बन चुका है। GST लागू होने के बाद राज्यों के पास टैक्स वसूली के सीमित विकल्प बचे हैं। शराबबंदी के कारण बिहार सरकार को आबकारी विभाग से मिलने वाला भारी राजस्व भी लगभग खत्म हो चुका है। 2015-16 में शराब से बिहार सरकार को ₹3,142 करोड़ का राजस्व मिला था, लेकिन शराबबंदी लागू होने के बाद यह लगभग शून्य हो गया।

इसी बीच पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) के 2025-26 के अनुमान के मुताबिक बिहार में इस साल करीब 161 से 167 करोड़ लीटर पेट्रोल और 295 से 306 करोड़ लीटर डीजल की खपत हो सकती है। अगर सरकार की प्रति लीटर कमाई के हिसाब से गणना की जाए तो सिर्फ पेट्रोल से करीब ₹3,550 करोड़ और डीजल से लगभग ₹4,810 करोड़ का राजस्व मिलने का अनुमान है। यानी दोनों मिलाकर राज्य सरकार को करीब ₹8,360 करोड़ की आमदनी हो सकती है।

बताया जा रहा है कि बिहार सरकार के कुल वाणिज्य कर संग्रह का करीब 18% से 20% हिस्सा अकेले पेट्रोल-डीजल से आने वाले VAT से आता है। ऐसे में सरकार के लिए इसे कम करना आसान नहीं माना जा रहा। सात निश्चय योजना, मुफ्त बिजली, पेंशन, महिला सहायता योजनाओं और सड़क-अस्पताल जैसे बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सरकार इसी राजस्व पर काफी हद तक निर्भर है।

उधर, तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ने लगा है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से फल-सब्जियों और राशन के दाम बढ़ सकते हैं। किसानों की खेती लागत बढ़ेगी क्योंकि ट्रैक्टर और पंपिंग सेट डीजल से चलते हैं। वहीं बस, ऑटो और स्कूल वाहनों के किराए में भी बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से महंगाई दर बढ़ती है, जिससे रिजर्व बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है और इसका असर घर, गाड़ी और पर्सनल लोन की EMI पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी फिलहाल थमती नहीं दिख रही। ईरान-अमेरिका तनाव के बाद क्रूड ऑयल की कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर के पार पहुंच चुकी हैं। अगर वैश्विक बाजार में यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल के दाम में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

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